
१ आप को सभी दिखता हैं , पर आप कुछ कर नहीं कर सकते , क्यों कि आप कर्त्ता नहीं हो ,आप दृष्टा हो, और यदि कर्त्ता बनने की चेष्टा की तो विशेष परिणाम प्राप्त होता हैं!
२ मनुष्य सत्य से काफी दूर है मानव से उत्कृष्ट मानव समाज भी !
३ आज , क्षण स्व की दृष्टि में भ्रष्ट हो गया है !
४ असत्यता की गहराई उत्तर गईहै !
५ वह तो घटित होना ही था ,ही !वह घटित होता जाता हैं !
६ आप स्वतः खड़े होते हो,बीच में !उस घटना का साक्षी भी और निमित्त भी !
७ तंत्र अगर बार -बार प्रभाव से प्रभावित होता रहें , तो तंत्र भ्रष्ट हो जाता है !
८ तंत्रों का समूह ही स्व तंत्र पर विशेष प्रभाव डालता हैं !
९
तंत्र का तंत्र के पीछे रहना ही प्रभाव है !
१० इस प्रभाव से मुक्त हो ,स्वयं को सत्य मार्ग पर चलाना ही आनन्द है, और यही मन का दुःख है !