व्यवहार : युवा
युवा जो कि अपार शक्ति है । युवा ताजा, पूर्ण, शुद्ध, कर्मठ, ज्ञान, है । युवा की कोई उम्र नहीं होती है । युवा एक बच्चे से लेकर एक वृद्ध तक कोई भी हो सकता है, शर्त है कि वह युवा गुणों से युक्त हो । हम युवाओं को कुछ व्यवहारिक बातों को समझना होगा । हम जो है वहीं हमारा व्यवहार है।

१. ईश्वरीय व्यवहार -
१. ईश्वर (अल्लाह, ईसा, नानक, ॐ, महावीर, बुद्ध, अन्य) और हम अलग नहीं है, अतः ईश्वर से परम आत्मीय सम्बन्ध होने चाहिए ।
२. हमें ईश्वरीय संकेतको पर चलना चाहिए ।
३. हमे ईमानदारी बरतनी चाहिए ।
४. ईश्वर का सतत अनुभव करना चाहिए ।
५. अंहकार,घृणा,क्रोध,भेद,जड़ता यह ईश्वर से हमारा व्यवहार बिगाड़ देता है ।
६. हमे ईश्वर के साथ सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए ।
७. धर्म को पढना , समझना और पूर्ण रूपेण जीवन में एक रस करना चाहिए ।
८. ईश्वर एक है, उसकी सत्ता को मानना चाहिए ।
९. हमें ईश्वर को हमारे हृदय में देखना चाहिए ।
१०. पूरे विश्व को ईश्वर के रूप में देखना चाहिए ।
२. मानवीय व्यवहार -
१. हमें निश्चित ही बच्चों को प्रेम से भर देना चाहिए । उसमे घृणा के लिए जरा सी भी जगह न रह जाए ।पर प्रेम के साथ अच्छे और बुरे का ध्यान रखना चाहिए ।
२. हमें निश्चित ही हमारे वृद्धों को माता - पिता तुल्य समझना चाहिए । उन्हें आदर और सम्मान देना चाहिए।
बाल-वृद्ध इन्हें पूर्ण सुरक्षा मिलनी चाहिए ।
३. स्त्री को माता - बहन के भाव से देखना चाहिए । पुरुष को पिता - भाई के भाव से देखना चाहिए, तद्अनुसार व्यवहार करना चाहिए।
४. पति को एक पत्नीधर्म का पालन करना चाहिए। पत्नी को एक पतिधर्म का पालन करना चाहिए।
५. समस्त विश्व हमारा परिवार है ।
६. हमे दुसरो के दुःखों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए।
७.हमें शाँत रहना चाहिए।
८. हमें समस्त जीवों से प्रेम करना चाहिए।
३.पाश्विक व्यवहार -
१. स्वयं के स्वार्थ को पूरा करते है । २. स्वयं के लिए लड़ते है । स्वयं की शक्ति बढ़ाते और दिखाते है ।
३. शक्ति के बल पर हर वस्तु पाने का प्रयास करते है ।
४. जीवन के लिए स्पर्था करते है, विवेक का प्रयोग नहीं करते है ।
५. स्वयं को श्रेष्ठ, अन्य को हीन समझते है ।
६. स्वयं को स्वछन्द और उन्मुक्त समझते है ।
४.अधम व्यवहार -
१. बुद्धि का अति प्रयोग करते है । २. छोटी - छोटी बातों पर झगड़ते है ।
३. दूसरों को डराते , सताते और भ्रम में रखते है ।
४. कूटनीतियों पर जीते है, षड्यंत्र करते है ।
५. हमेशा मद (धमंड, नशा ) में रहते है ।
६. छल-कपट करते है, स्वयं के हितों के लिए सृष्टि तक का विनाश कर सकते है ।
No comments:
Post a Comment