Thursday, March 24, 2016

हनुमानाष्टक

                                 श्री संकटमोचक हनुमानाष्टक


बाल समय रवि भक्षि लियो तब , तीनहुं लोक भयो अंधियारो ।
ताहि सों त्रास भयो जग को , यह संकट काहु सो जात न टारो ।
देवन आनि करी विनती तब , छांडि दियो रबि कष्ट निवारो ।।
को नंहि जानत है जग में कपि , संकटमोचक नाम तिहारो ।।१।

बालि की त्रास कपीस बसै गिरी , जात महाप्रभु पंथ निहारो ।  
चौंकि महा मुनि साप दियो तब , चाहिय कौन बिचार बिचारो ।
कै द्विज रुप लिवाय महाप्रभु , सो तुम दास के सोक निवारो ।।को.२।

अंगद के संग लेन गये सिय, खोज कपीस यह बैन उचारो ।
जीवत ना बचिहौ हम सो जु, बिना सुधि लाए इहाँ पगु धारो ।
हेरि थके तट सिंधु सबै तब, लाए सिया-सुधि प्रान उबारो ।।को.३।

रावन त्रास दई को सब, राक्षसि सों कहि सोक निवारो । 
ताहि समय हनुमान महाप्रभु, जाय महा रजनीचर मारो ।
चाहत सीय असोक सो आगि सु, दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो ।।को.४।

बान लग्यो उर लछिमन के तब, प्रान तजे सुत रावण मारो ।
लै गृह वैध सुषेन समेत, तबै गिरि द्रोन सु बीर उपारो ।
आनि संजीवन हाथ दई तब, लछिमन के तुम प्रान उबारो ।।को.५।

रावन जुद्ध अजान कियो तब, नाग कि फास सबै सिर डारो ।
श्रीरघुनाथ समेत सबै दल, मोह भयो यह संकट भारो ।
आनि खगेश तबै हनुमान जु, बन्धन काटि सुत्रास निवारो ।।को.६।

बंधु समेत जबै अहिरावन, लै रघुनाथ पाताल सिधारो ।
देबिहिं पूजि भली विधि सों बलि, देउ सबै मिलि मंत्र विचारो ।
जाय सहाय भयो तब ही, अहिरावन सैन्य समेत संहारो ।।को.७।

काज किए बड़ देवन के तुम, बीर महाप्रभु देखि विचारो ।
कौन सो संकट मोर गरीब को, जो तुमसों नहिं जात है टारो ।


बेगि हरो हनुमान महाप्रभु, जो कछु संकट होय हमारो ।।को.८।

                        दोहा

लाल देह लाली लसै,
            अरु धरि लाल लंगूर ।
वज्र देह दानव दलन,
            जय जय जय कपि सूर ।। 

Saturday, February 13, 2016

गीता सार

       गीता सार

१-जो हुआ वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है वह भी अच्छा हो रहा  है ।जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा।भूत का पश्चाताप मत करो ,भविष्य की चिन्ता भी मत करो।

२-क्यों व्यर्थ चिन्ता करते हो ? किससे व्यर्थ डरते हो ? कौन तुम्हें मार सकता है ?  आत्मा न पैदा होती है न मरती है।
३-तुम्हारा क्या गया ? तुम क्या लाये थे ,जो तुमने खो दिया ? तुमने क्या पैदा किया था ,जो नाश हो गया ?
४-न तुम कुछ लेकर आये, जो लिया  यहीं से लिया ,जो दिया यहीं पर दिया । जो लिया परमात्मा से लिया , जो दिया परमात्मा को दिया । खाली हाथ आए , खाली हाथ चले ।
जो आज तुम्हारा है कल किसी और का था , परसों  किसी और का होगा  ।
परिवर्तन  संसार का नियम है  ।
५-जिसे तुम मृत्यु समझते हो ,वही तो जीवन है । एक क्षण में तुम करोड़ो के स्वामी बन जाते हो , दूसरे ही क्षण में तुम दरिद्र हो जाते हो ।
मेरा-तेरा ,छोटा-बड़ा, अपना-पराया मन से मिटा दो ,विचार से हटा दो ,फिर सब तुम्हारा है ,तुम सबके हो ।
६-न यह शरीर तुम्हारा है ,न तुम शरीर के हो। यह नश्वर शरीर अग्नि ,जल ,पृथ्वी , आकाश से बना है और इसी में मिल जायेगा  ।
आत्मा स्थिर है ,अनश्वर है, फिर दु:ख क्यों ?
तुम अपने आप को भगवानको अर्पित करो । यही सब से उत्तम सहारा है । जो इस सहारे को जानता है , वह भय .चिन्ता ,शोक से सर्वदा मुक्त है  ।
७-जो कुछ भी तुम करते हो ,उसे ईश्वर को अर्पण करते चलो । इसी से तुम सदा जीवन -मुक्ति -आनन्द अनुभव करोगे ।